भाई साहब एडीओ हैं!'—बरेली में 5 साल से चल रही थी फर्जी कीटनाशकों की 'फैक्ट्री', जानिए अफसरों के हाथ-पांव फूलने की पूरी कहानी

बरेली में फर्जी कीटनाशक फैक्ट्री के पीछे का सच! जानिए कैसे भाई के एडीओ पद और झूठी शिकायतों के खौफ से अफसर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और दीपेंद्र सैनी का 'रामगंगा सीड्स' का खेल चलता रहा।

भाई साहब एडीओ हैं!'—बरेली में 5 साल से चल रही थी फर्जी कीटनाशकों की 'फैक्ट्री', जानिए अफसरों के हाथ-पांव फूलने की पूरी कहानी
जनवार्ता लाइव।

जनवार्ता लाइव

बरेली।

कृषि विभाग की मेहरबानी हो और घर में एडीओ भाई की छत्रछाया, तो कानून के हाथ भी 'कीटनाशक' की तरह बेअसर हो जाते हैं! बरेली में पिछले पांच सालों से नकली कीटनाशक बनाने का कारोबार धड़ल्ले से फल-फूल रहा था और विभाग के जिम्मेदार अफसर मानों मोक्ष प्राप्ति के ध्यान में बैठे थे।

कहानी के मुख्य किरदार हैं रामगंगा सीड्स के कर्ता-धर्ता दीपेंद्र सैनी। खेल बड़े ही कायदे से शुरू हुआ। सबसे पहले डेलापीर पर 'रामगंगा सीड्स' नाम से एक रिटेल की दुकान सजाई गई। फिर क्या था, कृषि मंत्रालय के फरीदाबाद स्थित कीटनाशक बोर्ड से पंजीकरण का 'शिल्ड' हासिल किया गया और इसी की आड़ में राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकारी से लाइसेंस भी जारी करा लिया गया।

स्थान बदला, लेकिन नियत नहीं!

शुरुआत में फैक्ट्री रजपुरा माफी में ओम प्रकाश पटेल के ठिकाने पर जमाई गई। सब ठीक चल रहा था, लेकिन 30 मई 2025 को मकान मालिक से खटपट हो गई। ओम प्रकाश ने प्लॉट खाली करा लिया। अब दीपेंद्र जी को नई जगह चाहिए थी, तो उन्होंने फतेहगंज पश्चिमी के गांव टिऊलिया में ओवरब्रिज के पास एक गुमनाम टिन शेड किराए पर ले लिया—बिना किसी बोर्ड या पहचान के!

लेकिन ट्विस्ट तब आया जब स्थान परिवर्तन की जांच करने बोर्ड की टीम पहुंच गई। मौके पर देखा तो हैरान—कीटनाशक जांचने के लिए लैब नदारद और जरूरी उपकरण गायब! उप निदेशक (लीगल सेल) अवनीश तोमर ने तुरंत मोर्चा संभाला और राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकारी को चिट्ठी ठोक दी—“साहब, लाइसेंस तो ले लिया है, पर मौके पर मानक शून्य हैं। लाइसेंस तुरंत निरस्त किया जाए!”

तो फिर अफसर क्यों डरते हैं?

अब सवाल उठता है कि इतनी रिपोर्टबाजी के बाद भी कार्रवाई का बुलडोजर क्यों ठप पड़ा था? जवाब छिपा है 'पारिवारिक रसूख' में।

दीपेंद्र सैनी के सगे भाई हैं गुनेंद्र कुमार सैनी, जो पिछले 10 सालों से बरेली के उप निदेशक कृषि प्रसार कार्यालय में एडीओ के पद पर अंगद की तरह पैर जमाए बैठे हैं। सूत्र बताते हैं कि एडीओ साहब को विभागीय काम-काज में तो खास दिलचस्पी रहती नहीं, लेकिन जैसे ही कोई वरिष्ठ अधिकारी काम करने को कहता है, साहब का 'शिकायत तंत्र' एक्टिव हो जाता है।

एडीओ साहब का खौफ ऐसा कि कोई अधिकारी जांच की फाइल को हाथ लगाने से भी कतराता है। वजह? जो भी जांच करने की सोचता है, उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण कोर्ट में फर्जी मुकदमेबाजी या शासन स्तर पर शिकायतों की झड़ी लगा दी जाती है। हालांकि, कोर्ट से कई मामले खारिज भी हो चुके हैं, लेकिन अफसरों में 'झंझट से बचने' का डर बरकरार रहा।

इसी 'अधिकारी भाई के कानूनी हथियारों' के डर से अफसर चुप्पी साधे रहे और नकली कीटनाशक का कारोबार खेतों की सेहत बिगाड़ता रहा।