बरेली के बाकरगंज और स्वाले नगर फाटक: आधुनिकीकरण के दावों की खुलती पोल और जाम में फंसी ज़िंदगी
बरेली के बाकरगंज और स्वाले नगर रेलवे फाटक पर पुरानी व्यवस्था के कारण रोज़ाना लगने वाले भीषण जाम और 12-12 घंटे ड्यूटी करने को मजबूर रेलवे कर्मचारियों की दुर्दशा पर पढ़ें एक रिपोर्ट। जानें कैसे दावों के उलट यहाँ सिस्टम दम तोड़ रहा है।
रवींद्र सिंह, जनवार्ता लाइव।
बरेली।
डिजिटल इंडिया और हाई-स्पीड ट्रेनों के इस सुहाने दौर में अगर आपको 'पाषाण युग' के दर्शन करने हों, तो बरेली के बाकरगंज और स्वाले नगर रेलवे फाटक आपका स्वागत करने के लिए बाहें फैलाए तैयार हैं। रेलवे विभाग भले ही देशभर में क्रॉसिंगों को इलेक्ट्रॉनिक और आधुनिक बनाने के बड़े-बड़े ढोल पीट रहा हो, लेकिन लगता है इन दोनों फाटकों तक आते-आते 'विकास एक्सप्रेस' का ईंधन ही खत्म हो गया है। आज भी ये फाटक उसी पुरानी और थकाऊ व्यवस्था के भरोसे चल रहे हैं।
इन फाटकों का बंद होना स्थानीय लोगों के लिए रोज़ाना के किसी 'महाजाम' के त्योहार से कम नहीं है। फाटक गिरते ही स्कूली बच्चे धैर्य की जो परीक्षा यहाँ देते हैं, वह उनके सिलेबस में भी नहीं होती। सबसे दयनीय स्थिति तो उन गंभीर मरीजों की है, जिनकी एंबुलेंस यहाँ घंटों सायरन बजाते हुए इस इंतज़ार में खड़ी रहती है कि शायद 'सिस्टम' का दिल पसीज जाए और उनकी जान बच सके।
मज़ेदार बात यह है कि इस खस्ताहाल व्यवस्था से सिर्फ जनता ही नहीं, बल्कि खुद रेलवे के कर्मचारी भी त्रस्त हैं। जहाँ श्रम नियम 8 घंटे की ड्यूटी का राग अलापते हैं, वहीं कई कर्मचारियों को 12-12 घंटे कोल्हू के बैल की तरह जोता जा रहा है। शायद रेलवे प्रशासन का मानना है कि जब तकनीक पुरानी है, तो कर्मचारियों के शोषण का तरीका भी अंग्रेज़ों के ज़माने का ही होना चाहिए! कर्मचारियों की मांग है कि ड्यूटी के घंटे समान रूप से 8 घंटे किए जाएं, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है।
अब यक्ष प्रश्न यह है कि जनता की चीख-पुकार और कर्मचारियों के पसीने की गंध से रेलवे प्रशासन की कुंभकर्णी नींद आख़िर कब टूटेगी? या फिर बरेली वासियों को इस 'विंटेज जाम' को ही अपना स्थायी भाग्य मान लेना चाहिए?