क्यारा बीईओ की अद्भुत वर्णमाला, शिक्षिका की टूटी उंगली में दिखा कदाचार, न्याय मांगना बना अवांछित इच्छा

बरेली के क्यारा क्षेत्र में एक शिक्षिका की शिकायत और बीईओ द्वारा जारी नोटिस को लेकर विवाद गहरा गया है। मामले में विभागीय कार्रवाई और कानूनी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

क्यारा बीईओ की अद्भुत वर्णमाला, शिक्षिका की टूटी उंगली में दिखा कदाचार, न्याय मांगना बना अवांछित इच्छा
पीड़ित सहायक अध्यापिका सीमा शर्मा

जनवार्ता लाइव
बरेली: बेसिक शिक्षा विभाग के क्यारा में इन दिनों न्याय का एक नया प्रशासनिक मॉडल लॉन्च हुआ है। यहाँ पीड़ित को न्याय मिले न मिले, लेकिन न्याय की गुहार लगाने वाले को ही अपराधी घोषित करने की फैक्ट्री पूरी रफ्तार से चल रही है। अपनी संवेदनशीलता के लिए मशहूर विभाग के खण्ड शिक्षा अधिकारी  पूरन सिंह ने एक पीड़ित महिला शिक्षिका को कारण बताओ नोटिस जारी कर कानून की जो नई व्याख्या की है, उसने हर किसी को हैरान कर दिया है।
 
मामला क्यारा के उच्च प्राथमिक विद्यालय का है। सहायक अध्यापिका सीमा शर्मा का आरोप है कि तत्कालीन प्रभारी प्रधानाध्यापक ने न सिर्फ उनके साथ गाली-गलौज की, बल्कि उनकी रिंग फिंगर भी तोड़ डाली। अब कायदे से तो विभाग को इस गुंडागर्दी पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए थी, लेकिन साहब का दिल नहीं पसीजा। जब टूटे हाथ से लाचार शिक्षिका ने मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल की चौखट पर माथा टेका, तो विभागीय अधिकारियों की अहंकार की उंगली उठ गई। न्याय मांगना साहब की डिक्शनरी में अचानक अनुशासनहीनता और कदाचार बन गया।

बीईओ क्यारा ने अपने सरकारी लेटरहेड पर बकायदा टाइप करवाया है कि शिक्षिका आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करवाकर अपनी "अवांछित इच्छाओं की पूर्ति करने का प्रयास कर रही हैं। अब जिले का प्रबुद्ध वर्ग माथा पीट रहा है कि आखिर एक महिला कर्मचारी के लिए अपनी टूटी उंगली और सरेबाजार नीलाम हुई गरिमा के लिए इंसाफ मांगना किस कोण से अवांछित इच्छा हो गया? शिक्षिका ने भी इस प्रशासनिक लफ्फाजी का तीखा विधिक जवाब देते हुए साहब को आईना दिखा दिया है और लिखित में वह शासनादेश मांग लिया है, जिसके तहत महिला उत्पीड़न के खिलाफ बोलना गुनाह की श्रेणी में आता हो। दफ्तर में बैठकर, बिना कोई लिखित समन जारी किए, सिर्फ फोन पर 'शाही फरमान' सुनाकर औपचारिकता पूरी करने वाले स्थानीय तंत्र को शिक्षिका ने विधिक रूप से घेर लिया है। इस मामले की आंच सहायक शिक्षा निदेशक और जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के दफ्तरों तक पहुंच चुकी है। साफ चेतावनी है कि अगर किसी विभागीय गुटबाजी या आरोपी को बचाने के चक्कर में शिक्षिका पर कोई एकतरफा दंडात्मक कार्रवाई थोपी गई, तो यह प्रशासनिक नौटंकी सीधे राज्य महिला आयोग और माननीय उच्च न्यायालय के कटघरे में खड़ी होगी, जहाँ बीईओ साहब को अपनी इस अवांछित भाषा का हिसाब देना भारी पड़ेगा।

साहब कानून से ऊपर या विधिक ज्ञान से पैदल?

खण्ड शिक्षा अधिकारी क्यारा द्वारा जारी इस नोटिस ने शिक्षा विभाग की विधिक समझ पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। साहब ने नोटिस में बड़े आत्मविश्वास के साथ लिखा है कि चूंकि कैंट पुलिस ने जांच में आरोपों को निराधार मानकर कार्रवाई समाप्त कर दी थी, इसलिए शिक्षिका का दोबारा शिकायत करना विभाग को गुमराह करना है। शायद बीईओ साहब इस बुनियादी कानूनी तथ्य से पूरी तरह अनजान हैं कि पुलिस की अंतिम रिपोर्ट कोई अंतिम न्याय नहीं होती। देश का कानून पीड़ित को यह मौलिक अधिकार देता है कि वह पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट के खिलाफ सक्षम न्यायालय में विरोध याचिका दाखिल कर सके और शिक्षिका की यह याचिका (प्रोटेस्ट पिटीशन) अदालत में फिलहाल गतिमान भी है। हद तो तब हो गई जब बीईओ ने शिक्षिका से जबरन यह शपथ पत्र मांग लिया कि उन्होंने कोर्ट में कोई वाद दर्ज नहीं कराया है। कानून के जानकारों का कहना है कि जो मामला पहले से ही माननीय न्यायालय के समक्ष विचाराधीन हो, उसके बीच में किसी प्रशासनिक अधिकारी द्वारा ऐसा हलफनामा मांगना सीधे तौर पर न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप और अदालत की अवमानना की श्रेणी में आता है। अब देखना यह है कि कानून की धज्जियां उड़ाने वाले इस शाही फरमान पर उच्च अधिकारी क्या रुख अपनाते हैं।