फाइल ले गया 'मछली' बाबू, प्रमुख सचिव साहब मौन! बरेली कृषि विभाग में 'विदाई' के साथ गायब हुई पत्रावली

बरेली कृषि विभाग में 'मछली बाबू' का बड़ा खेल! तबादले के साथ ही यंत्रीकरण योजना की महत्वपूर्ण फाइल गायब। जानिए कैसे रिटायर्ड कर्मचारी से 10% कमीशन मांगने और विभागीय साजिशों का खेल जारी है।

फाइल ले गया 'मछली' बाबू, प्रमुख सचिव साहब मौन! बरेली कृषि विभाग में 'विदाई' के साथ गायब हुई पत्रावली
जनवार्ता लाइव।

प्रमुख सचिव साहब! 'मछली' बाबू ले गया फाइल, अब एफआईआर लिखेगा कौन?

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बरेली।

कृषि विभाग को 'अर्श से फर्श' पर पहुँचाने की ख्याति प्राप्त कर चुके चर्चित बाबू एक बार फिर नए कारनामे को लेकर सुर्खियों में हैं। विभाग में चर्चा है कि 'मछली बाबू' उर्फ अनुराग पालीवाल जब जून में बरेली से पीलीभीत के लिए रवाना हुए, तो सिर्फ अपनी यादें ही नहीं ले गए, बल्कि यंत्रीकरण योजना की एक बेहद अहम और संवेदनशील फाइल भी साथ समेट ले गए। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या बरेली कृषि विभाग में फाइलों की विदाई भी बाबुओं के पर्सनल लगेज के साथ ही होती है?

साजिश का 'जाल' और गायब पत्रावली

पूरा मामला एक तत्कालीन अधिकारी को यंत्रीकरण योजना में उलझाने से जुड़ा है। आरोप है कि 'मछली बाबू' ने जेडीए-एडीए के साथ सांठ-गांठ कर अधिकारी को चार्जशीट थमा दी। नियमानुसार जब पीड़ित अधिकारी ने अपना पक्ष रखने के लिए पत्रावली से संबंधित अभिलेख मांगे, तो उप निदेशक कृषि (डीडीसी) ओपी मिश्र के पास कोई जवाब ही नहीं था। दो-दो बार पत्र लिखे जाने के बाद जब अलमारियाँ खंगाली गईं, तो पता चला कि फाइल तो साहब के चहेते बाबू की विदाई के साथ ही 'हवा' हो चुकी है।

नियम तो यह कहता है कि यदि दफ्तर से फाइल गायब हुई है, तो उसकी सीधी जिम्मेदारी उप निदेशक कृषि की बनती है और तत्काल एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। लेकिन साहेब का मौन और विभागीय सुस्ती बता रही है कि फाइल ढूँढने की नीयत ही गायब है। जब मन होता है, यह बाबू पीलीभीत और बीसलपुर होते हुए जेडीए कार्यालय पहुँचकर नए षड्यंत्र का ताना-बाना बुनने लगते हैं।

अब जनता पूछ रही है कि जो प्रमुख सचिव साहब अपनी ईमानदारी का ढिंढोरा पीटते नहीं थकते, वे फाइल चोरी होने पर एफआईआर दर्ज कराने का आदेश देने से कतरा क्यों रहे हैं? क्या ईमानदारी सिर्फ बयानों तक ही सीमित है?

मेडिकल क्लेम पर 10% का कट!

कारनामे यहीं खत्म नहीं होते। भूमि संरक्षण से उप निदेशक कार्यालय में पधारे एक और 'कर्मठ' बाबू राजकुमार का जलवा भी कम नहीं है। चर्चा है कि वे एक सेवानिवृत्त कर्मचारी के जायज मेडिकल क्लेम में से भी '10 प्रतिशत' का कट मांगे बिना फाइल आगे बढ़ाने को तैयार नहीं हैं। रिटायरमेंट के बाद बीमारी के पैसों पर भी यह 'हाथ की सफाई' दफ्तर के गिरते स्तर की गवाही दे रही है।

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