उदयपुर की ऐतिहासिक 'बागोर की हवेली': मेवाड़ की संस्कृति और कला का जीवंत केंद्र
उदयपुर की प्रसिद्ध बागोर की हवेली के इतिहास, वास्तुकला और प्रसिद्ध 'धरोहर' लोक नृत्य शो के बारे में पूरी जानकारी। जानिए क्यों पर्यटकों के लिए यह खास आकर्षण है।
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उदयपुर।
राजस्थान की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नगरी उदयपुर में पिछोला झील के किनारे स्थित बागोर की हवेली देश-विदेश के पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। मेवाड़ की प्राचीन संस्कृति, वास्तुकला और लोक कलाओं को समेटे यह ऐतिहासिक धरोहर पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
18वीं शताब्दी में हुआ था निर्माण:
इस भव्य हवेली का निर्माण 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में 1751 से 1778 के बीच मेवाड़ राज्य के तत्कालीन प्रधानमंत्री अमर चंद बड़वा की देखरेख में करवाया गया था। बाद में यह राजपरिवार के अधिकार में आ गई और बागोर के महाराज को आवंटित की गई, जिसके बाद से इसे 'बागोर की हवेली' के नाम से जाना जाने लगा।
शानदार वास्तुकला और कलाकृतियां:
पिछोला झील के गंगौर घाट के पास स्थित इस विशाल हवेली में लगभग 138 कमरे, सुंदर आंगन, कई गलियारे और नक्काशीदार झरोखे बने हुए हैं। हवेली के कमरों की दीवारों पर किया गया पुराना कांच का काम (मिरर वर्क) और पारंपरिक मेवाड़ शैली के भित्तिचित्र उस काल की समृद्ध कला का बेहतरीन नमूना पेश करते हैं। वर्तमान में इसे एक संग्रहालय में बदल दिया गया है, जहां शाही वेशभूषा, पगड़ियों के अनूठे संग्रह और प्राचीन वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है।
लोक संस्कृति का जीवंत मंच 'धरोहर':
बागोर की हवेली की सबसे बड़ी खासियत यहां शाम को आयोजित होने वाला प्रसिद्ध 'धरोहर' लोक नृत्य शो है। एक घंटे के इस सांस्कृतिक कार्यक्रम में राजस्थान के पारंपरिक नृत्य जैसे घूमर, भवाई, चरी और कठपुतली कला का शानदार प्रदर्शन किया जाता है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं।
यदि आप उदयपुर की यात्रा कर रहे हैं, तो अपनी सूची में बागोर की हवेली को जरूर शामिल करें।