शिक्षा माफियाओं का 'जादूगर' या डीआईओएस ऑफिस का 'सुपर बॉस'? 15 साल से एक ही कुर्सी पर जमे संजय यादव का खेल

बलिया के डीआईओएस कार्यालय में न्याय नहीं, बल्कि पटल प्रभारी संजय यादव की जादूगरी चलती है। पिछले डेढ़ दशक से जड़ें जमाए इस बाबू ने आईजीआरएस जैसी पारदर्शी व्यवस्था को भ्रष्टाचार का टूलकिट बना दिया है।

शिक्षा माफियाओं का 'जादूगर' या डीआईओएस ऑफिस का 'सुपर बॉस'? 15 साल से एक ही कुर्सी पर जमे संजय यादव का खेल
जनवार्ता लाइव।

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बलिया।

यूं तो जिले के डीआईओएस  कार्यालय के बाहर नेमप्लेट पर साहब का नाम मनोज कुमार मिश्रा लिखा है, लेकिन दफ्तर की असली सत्ता 'सुपर बॉस' यानी पटल प्रभारी संजय यादव की उंगलियों पर नाचती है। पिछले 10-15 सालों से यह महाशय इस कुर्सी पर अंगद का पैर जमाकर बैठे हैं। सरकारें आईं और गईं, कई अधिकारी बदले, लेकिन संजय यादव का बाल भी बांका नहीं हुआ। आखिर हो भी कैसे? भ्रष्टाचार की भारी-भरकम फाइलों को 'जादूगरी' से गायब करने की जो महारत उनके पास है, वो शिक्षा विभाग में किसी और के पास नहीं।

उत्तर प्रदेश सरकार के आईजीआरएस  पोर्टल को इस पटल प्रभारी ने अपने लिए 'रद्दी की टोकरी' बना लिया है। जब भी बांसडीह इंटर कॉलेज के फर्जीवाड़े जैसे गंभीर मामले में कोई फरियादी पुख्ता साक्ष्य लेकर पहुंचता है, तो संजय यादव अपनी फाइलबाजी का ऐसा तिलिस्म रचते हैं कि डीआईओएस साहब उसे बिना देखे "मामला न्यायालय में विचाराधीन है" का ठप्पा लगाकर दफना देते हैं।

हैरानी इस बात की नहीं है कि प्रधान लिपिक दयानंद पाठक ने अपने ही बेटे सिद्धार्थ की फर्जी नियुक्ति करवा ली; सबसे शर्मनाक यह है कि संजय यादव जैसे मठाधीशों की सेटिंग-गेटिंग के आगे उच्च न्यायालय की फटकार भी बेअसर साबित हो रही है। साक्ष्यों का सरेआम कत्ल किया जा रहा है और 15 साल की इस 'संस्थागत सांठगांठ' ने साबित कर दिया है कि बलिया शिक्षा विभाग में न्याय अंधा नहीं, बल्कि संजय यादव की जेब में है।

अब बड़ा सवाल यह है कि शासन का हंटर इस 'बाबू' के तिलिस्म को कब तोड़ेगा या बलिया का शिक्षा विभाग ऐसे ही इनके सर्कस का अखाड़ा बना रहेगा?