सुप्रीम कोर्ट के झटके के बाद 'स्पेशल टीईटी' की तैयारी: बरेली BSA ने 3 दिन में मांगी रिपोर्ट, पुराने शिक्षक बोले- यह 'अंधा कानून'

सुप्रीम कोर्ट से रिव्यू पिटीशन खारिज होने के बाद बेसिक शिक्षा विभाग ने 'स्पेशल टीईटी' की तैयारी शुरू कर दी है। बरेली बीएसए ने सभी बीईओ से तीन दिन में शिक्षकों का डेटा तलब किया है। वहीं, पुराने कानून को बैकडेट से लागू करने के विरोध में शिक्षक आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं।

सुप्रीम कोर्ट के झटके के बाद 'स्पेशल टीईटी' की तैयारी: बरेली BSA ने 3 दिन में मांगी रिपोर्ट, पुराने शिक्षक बोले- यह 'अंधा कानून'
फोटो: जनवार्ता लाइव।

इकरार। जनवार्ता लाइव 

बरेली, देवरनियां। देश की सर्वोच्च अदालत के कड़े रुख के बाद बेसिक शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है। सरकार अब बिना टीईटी (TET) पास किए नौकरी कर रहे बेसिक शिक्षकों के लिए 'स्पेशल टीईटी' आयोजित करने की रणनीति पर काम कर रही है। सुप्रीम कोर्ट से राहत न मिलने के बाद विभाग ने शिक्षकों का डेटा जुटाना शुरू कर दिया है, लेकिन 2010 के कानून को पुरानी नियुक्तियों पर लागू किए जाने से शिक्षकों में भारी आक्रोश है और वे बड़े आंदोलन की राह पर हैं।

3 दिन का अल्टीमेटम: बीएसए का सख्त निर्देश

स्पेशल टीईटी की योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए शासन ने सभी जिलों के बेसिक शिक्षा अधिकारियों (BSA) से बिना टीईटी पास शिक्षकों का सटीक आंकड़ा मांगा है।इसी क्रम में बरेली बीएसए डॉ. विनीता ने सभी खंड शिक्षा अधिकारियों को सख्त निर्देश जारी किए हैं।

आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि 3 दिन के भीतर निर्धारित प्रपत्र पर प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत उन शिक्षकों की रिपोर्ट हर हाल में प्रस्तुत की जाए, जो टीईटी या सीटीईटी पास नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला और बढ़ती समय-सीमा

बीते 1 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने टीईटी अनिवार्यता पर एक अहम फैसला सुनाया था, जिसका सीधा असर देशभर के करीब 25 लाख शिक्षकों की नौकरी पर पड़ा।

यूपी की योगी सरकार और प्राथमिक शिक्षक संघ सहित कई अन्य संगठनों ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर की थी।

29 मई को सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।

हालांकि, शिक्षकों को राहत देते हुए टीईटी पास करने की समय-सीमा एक साल बढ़ाकर 31 अगस्त 2028 कर दी गई है।

शिक्षकों का फूटा गुस्सा: "यह घोर नाइंसाफी है"

सुप्रीम कोर्ट के रुख और सरकार की नई तैयारी ने शिक्षकों को आर-पार की लड़ाई के लिए लामबंद कर दिया है। शिक्षक 2017 के भारत सरकार के संशोधन को अपने गले की फांस मान रहे हैं।

वरिष्ठ शिक्षक नेता हरीश बाबू शर्मा ने बेबाक लहजे में कहा कि टीईटी अनिवार्यता का कानून 2010 में बना और यूपी में 2011 में लागू हुआ। ऐसे में जिन शिक्षकों की नियुक्ति 2011 से पहले हो चुकी है, उन पर इसे थोपना तानाशाही और घोर नाइंसाफी है। इतिहास गवाह है कि कोई भी कानून 'बैक डेट' (पूर्व प्रभाव) से लागू नहीं होता।

"क्या पुराने आईएएस और पीसीएस देंगे दोबारा परीक्षा?"

शिक्षकों का तर्क है कि हर सरकारी नौकरी में चयन के समय के तात्कालिक मानक होते हैं। क्या 20-25 साल से कार्यरत आईएएस, पीसीएस या नेट पास कर्मचारियों से मौजूदा नियमों के तहत दोबारा परीक्षा ली जाती है? खेल शुरू होने के बाद नियम नहीं बदले जाते, लेकिन देश के 25 लाख शिक्षकों के साथ यह भद्दा मजाक किया जा रहा है।

राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. दिनेश चंद्र शर्मा की अगुआई में प्राथमिक शिक्षक संघ ने इस 'अंधे कानून' के खिलाफ व्यापक रणनीति तैयार कर ली है। शिक्षकों ने प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजे हैं और अब संसद में भी इस कानून में संशोधन की मांग गूंजने लगी है। साथियों की सेवा सुरक्षा के लिए शिक्षक संगठन हर स्तर पर कड़ा संघर्ष करने को तैयार हैं।