फाइल पर 'कुंडली' मारकर बैठे अफसर, हाईकोर्ट के आदेश पर भी नहीं टूट रही Bareilly BSA दफ्तर की 'कुंभकर्णी नींद'!

बरेली जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय ने हाईकोर्ट और सचिव के आदेश के बावजूद दो शिक्षकों को महीनों से कार्यमुक्त न करने पर जानिए सरकारी लेटलतीफी का पूरा सच।

फाइल पर 'कुंडली' मारकर बैठे अफसर, हाईकोर्ट के आदेश पर भी नहीं टूट रही Bareilly BSA दफ्तर की 'कुंभकर्णी नींद'!
जनवार्ता लाइव

जनवार्ता लाइव

बरेली।

कहते हैं कि सरकारी दफ्तरों में फाइलें सरकती नहीं, उन्हें सरकाना पड़ता है। लेकिन जब मामला बरेली के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय का हो, तो यहाँ फाइलें फेविकोल का मजबूत जोड़ बनकर एक ही जगह चिपक जाती हैं। यहाँ न तो  उच्च न्यायालय  के आदेश की हनक काम आती है और न ही विभाग के सर्वोच्च सचिव साहब के ट्रांसफर ऑर्डर की कोई बिसात है।

तभी तो, दो शिक्षक महीनों से अपनी ही रिलीविंग (कार्यमुक्ति) का आर्डर पाने के लिए दफ्तर के चक्कर काट-काटकर अपने जूते घिस चुके हैं, लेकिन बीएसए साहब का दिल है कि पसीजता ही नहीं!

### हाईकोर्ट का आदेश? अरे, वो तो बस एक कागज है!

मामला सहायक अध्यापक मोहम्मद फहीम और सहायक अध्यापिका शशि गंगवार से जुड़ा है। इन दोनों का ट्रांसफर बेसिक शिक्षा परिषद, प्रयागराज के सचिव साहब ने बहुत पहले ही मंजूर कर दिया था। लेकिन बरेली बीएसए दफ्तर को शायद प्रयागराज से आने वाले फरमानों में वजन कम लगा। जब महीनों तक शिक्षकों को रिलीव नहीं किया गया, तो परेशान होकर शिक्षक हाईकोर्ट पहुंच गए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले साल 11 फरवरी को साफ-साफ कहा था—कानून के मुताबिक कारण बताते हुए स्पष्ट आदेश जारी करें। आदेश की कॉपी 25 फरवरी को ही दफ्तर की टेबल पर सजा दी गई थी। लेकिन साहब, कोर्ट-कचहरी के आदेश आम जनता के लिए होते हैं, सरकारी बाबुओं और अफसरों के लिए तो ये फाइल का वजन बढ़ाने वाले कागज मात्र हैं। नतीजा? ढाक के वही तीन पात!

### डीएम साहब ने जगाया, तो आँख खुली... पर फिर सो गए!

जब कोर्ट के आदेश के बाद भी दफ्तर में 'अमरूद के पत्तों की तरह' सन्नाटा छाया रहा, तो शिक्षकों ने थक-हारकर अप्रैल में जिलाधिकारी  बरेली की चौखट पर माथा टेका। डीएम साहब ने जब कड़ा रुख अपनाया, तो बीएसए दफ्तर की नींद थोड़ी सी खुली। आनन-फानन में 30 अप्रैल को 'सुनवाई' का नाटक रचा गया। दोनों तरफ से कागज जमा हुए, दलीलें दी गईं। शिक्षकों को लगा कि चलो, अब तो न्याय की गंगा बहेगी!

लेकिन अफ़सोस! सुनवाई à