पीडब्ल्यूडी का अनोखा 'फेविकोल मॉडल': नियम बदलते रहे, पर 'खास' पटलों से नहीं हिलीं साहबों की कुर्सियाँ!
लोक निर्माण विभाग में तबादला नीति को लेकर फिर सुगबुगाहट तेज है। नियम पारदर्शिता के गाए जा रहे हैं, लेकिन कुछ संवेदनशील पटलों पर सालों से एक ही 'चेहरे' जमे हुए हैं। जानिए कैसे चल रहा है पीडब्ल्यूडी का यह अनोखा प्रशासनिक संतुलन।
पीडब्ल्यूडी का अनोखा 'फेविकोल मॉडल': नियम बदलते रहे, पर 'खास' पटलों से नहीं हिलीं साहबों की कुर्सियाँ!
जनवार्ता लाइव
बरेली।
लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के गलियारों में इन दिनों एक नया शोध विषय चर्चा में है—"तबादला नीति बनाम कुर्सी का स्थायित्व।" विभाग में जब-जब शासन की ओर से ‘पारदर्शिता’, ‘निष्पक्षता’ और ‘प्रशासनिक संतुलन’ जैसे भारी-भरकम शब्दों वाली तबादला नीति का फरमान जारी होता है, तो बाकी कर्मचारी अपना बोरिया-बिस्तर समेटने की तैयारी करने लगते हैं। लेकिन विभाग के कुछ ‘खास’ और ‘संवेदनशील’ पटलों की कुर्सियाँ मानो फेविकोल के सबसे मजबूत जोड़ से चिपकी हुई हैं; नियम आते हैं, हवा का झोंका बनकर गुजर जाते हैं, पर ये कुर्सियाँ अपनी जगह से टस से मस नहीं होतीं!
'समान नियम, पर अलग-अलग किस्मत'
विभागीय सूत्रों के गॉसिप कॉरिडोर से छनकर आ रही खबरों पर यकीन करें तो आम कर्मचारियों में इस बात को लेकर भारी कौतूहल है कि नियम आखिर किसके लिए बनते हैं? एक तरफ तो कुछ कर्मचारी ऐसे हैं जो अभी एक जगह चाय की चुस्की ठीक से ले भी नहीं पाते कि उनका तबादला पत्र हाथ में थमा दिया जाता है। वहीं दूसरी तरफ, विभाग के 'अति-संवेदनशील' और 'मलाईदार' माने जाने वाले पटलों पर वर्षों से वही पुराने और अनुभवी चेहरे विराजमान हैं।
कहावत तो यह है कि समय-समय पर पानी और कर्मचारी बदलते रहने से 'सड़न' नहीं होती और कार्यसंस्कृति में ताजगी बनी रहती है। लेकिन पीडब्ल्यूडी का यह विशेष वर्ग शायद इस सिद्धांत को नकारता है। उनका मानना है कि एक ही पटल पर सालों-साल डटे रहना ही असली ‘अनुभव’ है—भले ही उस अनुभव से पक्षपात की गंध आने लगे और नए कर्मचारियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका सिर्फ खाली फाइलें पलटने तक ही सीमित रह जाए!
अधिकारियों का 'रेडीमेड' जवाब
जब इस 'स्थायी तैनाती' के अद्भुत रहस्य पर विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी से जवाब माँगा गया, तो उन्होंने हमेशा की तरह वही घिसा-पिटा और सुरक्षित बयान जारी किया—"स्थानांतरण पूरी तरह से शासन की नीति और प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार ही होते हैं। यदि किसी को कोई शिकायत है, तो वह उचित माध्यम से आवेदन दे सकता है, जिस पर 'नियमानुसार' विचार होगा।"
अब साहब के इस 'नियमानुसार विचार' का मतलब तो विभाग का हर कर्मचारी बखूबी समझता है—यानी शिकायत फाइल में दबेगी और साहब अपनी कुर्सी पर बने रहेंगे!
जनता के विश्वास और कागजी पारदर्शिता का 'पुल'
फिलहाल, आम कर्मचारियों ने मांग उठाई है कि कम से कम एक बार इन 'अमर' पटलों की निष्पक्ष समीक्षा तो हो जाए! कर्मचारियों का कहना है कि जिस विभाग का काम जनता के लिए मजबूत पुल और सड़कें बनाना है, कम से कम उसे अपनी व्यवस्था में 'पारदर्शिता और जनता के विश्वास' का पुल भी मजबूत रखना चाहिए।
लेकिन सवाल वही है: क्या शासन की तबादला नीति इन खास पटलों का दरवाजा खटखटा पाएगी, या फिर 'समान अवसर और जवाबदेही' के दावे सिर्फ बैठकों के मिनट्स (Minutes) और भाषणों तक ही सिमटकर रह जाएंगे? फिलहाल तो विभाग में एक ही गाना गूँज रहा है—"कुर्सी न छोड़े, चाहे नीति बदल जाए!"